प्रसव के तुरंत बाद बच्चे को पिलाएं, मां का पहला पीला गाढ़ा दूध

प्रसव के तुरंत बाद बच्चे को पिलाएं, मां का पहला पीला गाढ़ा दूध
देखभाल
-हाइपोग्लाइसिमिया और हाइपोथर्मिया से करता है बचाव, रोग से लड़ने की बढ़ाता है क्षमता, संस्थागत प्रसव जरूरी
-जन्म के तुरंत बाद बच्चे को देखभाल की होती है ज्यादा जरूरत, शरीर का तापमान बनाएं रखना है जरूरी
जौनपुर, 27 सितम्बर 2022
बच्चे के जन्म के बाद का पहला घंटा उसके जीवन का आधार तैयार करता है। इसलिए प्रसव के एक घंटे के भीतर के समय को “गोल्डेन आवर” कहते हैं। इसे ध्यान में रखते हुए हमेशा संस्थागत प्रसव को ही प्राथमिकता देनी चाहिए। क्योंकि बच्चे के जन्म के पहले घंटे “गोल्डेन आवर का एक-एक मिनट कीमती होता है और वह बच्चे के स्वास्थ्य की नींव तैयार करता है।
पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) के प्रभारी डॉ राम नगीना यादव कहते हैं कि जब बच्चा मां के पेट में होता है तो वहां का तापमान 37-38 डिग्री सेल्सियस रहता है। जब वह बाहर आता है तो अचानक 21-22 डिग्री सेल्सियस तापमान हो जाता है जबकि 25 डिग्री सेल्सियस से कम का तापमान होना बेहद ख़तरनाक होता है। तापमान कम रहने पर बच्चे को हाइपोथर्मिया (ठंड मारना) की आशंका रहती है। इस बीमारी में बच्चे को ठंड लगती है। उसके हृदय और फेफड़े काम करना बंद कर देते हैं और खून का प्रवाह रुक जाता है। इससे जान जा सकती है। इसलिए मां और बच्चे का तापमान बनाएं रखना चाहिए । प्रसव के तुरंत बाद का पहला मिनट मां और बच्चे दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है। ठंड के मौसम में तो और भी ज्यादा देखभाल की जरूरत है। जन्म के समय प्रसव कक्ष को गर्म रहना चाहिए। इसके लिए दीवारों पर हीटर लगाया जाता है। खिड़कियां बंद कर दी जाती हैं ताकि ठंडी हवा सीधे कमरे में न आ सके। ऐसे में बच्चे को मां की छाती से लगा देना चाहिए। मां की छाती से लगाते समय बीच में कपड़ा भी नहीं रहे। बच्चे की त्वचा से मां की त्वचा सटी हो। मां की त्वचा से सटे होने पर बच्चे को ठंड नहीं लग पाती है। साथ ही जल्दी मां के शरीर में दूध उतरने लगता है। बच्चा जब रोता है तो मां को लगता है कि वह भूखा है। इसके चलते उसके शरीर में तेजी से दूध बनने लगता है और अपने आप दूध निकलने लगता है। यह दूध ही उसे हाइपोथर्मिया से भी बचाता है। साथ ही रोग से लड़ने की क्षमता को भी बढ़ाता है। प्रसव के बाद बच्चे को देखकर मां अपना दर्द भूल जाती है। प्रसव के बाद खून बहने से मां की जान जाने का खतरा (पोस्ट पार्टम हैमरेज) रहता है। बच्चे को चिपका देने से मां के शरीर से निकलने वाली खून की यह प्रक्रिया रुक जाती है। वही हाइपोग्लाइसीमिया नामक एक और स्थिति जिसमें बच्चों में ब्लड शुगर का स्तर घट सकता है ऐसे में इससे बचने के लिए जितना जल्दी हो सके या घंटे के अंदर बच्चे को मां का पहला पीला गाढ़ा दूध जरूर पिला देना चाहिए। बच्चें के ब्लड शुगर का स्तर नियंत्रित रखने के लिए स्तनपान सबसे अच्छा होता है। मां का दूध ही बच्चे को हाइपोथर्मिया और हाइपोग्लाइसिमिया दोनों से बचाता है।
डॉ राम नगीना यादव कहते हैं कि जन्म के तुरंत बाद बच्चे का रोना बहुत जरूरी होता है। इसलिए बच्चे के जन्म के समय एक पीडियाट्रीशियन की मौजूदगी बेहद जरूरी है। गला फंसा होने से बच्चा रो नहीं पाता है। पीडियाट्रीयन बच्चे के मुंह, नाक आदि की अच्छे से साफ-सफाई कर उसे सांस लेने में आ रही दिक्कतों को दूर कर देता है।
बच्चे को छह माह से पहले कभी भी शहद, चीनी और पानी नहीं देना चाहिए। पैदा होते ही बच्चे को बीसीजी और हेपेटाइटिस का टीका लगवा देना चाहिए। छह माह तक सिर्फ और सिर्फ मां का दूध ही पिलाना चाहिए। इस समय बोतल वाला दूध भी नहीं देना चाहिए इससे बच्चे को संक्रमण की सम्भावना बनी रहती है। मां का दूध पीने से बच्चे का शारीरिक और मानसिक विकास होता है। बच्चे कम बीमार होते हैं। छह महीने बाद मां के दूध के साथ अर्द्ध ठोस आहार देना चाहिए जो कि आधा गीला और आधा सूखा रहे जैसे खिचड़ी, केला और दूध का पेस्ट बना कर देना चाहिए जिससे कि बच्चे उसे आराम से खा पाए। दो वर्ष से अधिक उम्र का हो जाने तक मां जब तक चाहे बच्चे को अपना दूध पिला सकती है।
