January 25, 2026

Jaunpur news एचआईवी/एड्स वैश्विक महामारी, नैतिकता और संस्कारवाद की सामाजिक चुनौती

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एचआईवी/एड्स वैश्विक महामारी, नैतिकता और संस्कारवाद की सामाजिक चुनौती

संस्कारों पर आधारित हमारी सामाजिक व्यवस्था में एचआईवी संक्रमण को लंबे समय तक कलंक और भेदभाव से जोड़कर देखा गया। परिणामस्वरूप इस संक्रमण की रोकथाम की दिशा में कई सामाजिक चुनौतियाँ खड़ी हुईं।
भेदभाव के वातावरण में लोग संक्रमण को छिपाते रहे, जिसके चलते संक्रमण और भी अधिक भयावह रूप लेता गया।

विश्व स्तर पर अफ्रीका के किंशासा क्षेत्र से प्रारंभ हुआ यह संक्रमण धीरे-धीरे विश्व के लगभग सभी देशों में फैल गया। भारत में 1986 में चेन्नई में पहली बार एचआईवी संक्रमण की पुष्टि हुई। उस समय यह धारणा थी कि भारतीय समाज में इसका प्रसार संभव नहीं है, परंतु बढ़ते संक्रमण ने सभी धारणाओं को गलत साबित कर दिया।

इसी गंभीरता को देखते हुए भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने वर्ष 1992 में राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (NACO) की स्थापना की, जिसके बाद देश में व्यापक स्तर पर जागरूकता और उपचार कार्यक्रम चलाए गए।


एचआईवी संक्रमण के प्रमुख चार कारण

  1. संक्रमित व्यक्ति के साथ असुरक्षित यौन संबंध
  2. संक्रमित व्यक्ति के रक्त के संपर्क में आना
  3. संक्रमित माँ से जन्म लेने वाले बच्चे में संक्रमण का स्थानांतरण
  4. संक्रमित सुई या ब्लेड का साझा उपयोग

नवयुवकों में टैटू का बढ़ता रुझान : नई चुनौती

आजकल युवाओं में टैटू बनवाने का चलन तेज़ी से बढ़ रहा है। यदि टैटू मशीनें, सुइयाँ और ब्लेड सही तरीके से स्टरलाइज न किए जाएँ तो संक्रमण का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। भविष्य में यह रुझान एक गंभीर स्वास्थ्य संकट उत्पन्न कर सकता है।
इसलिए टैटू प्रैक्टिस पर नियंत्रण, लाइसेंसिंग और सुरक्षा मानकों को सख़्ती से लागू करने की आवश्यकता है।


सरकार द्वारा किए गए महत्वपूर्ण प्रयास

भारत में सरकार ने एचआईवी संक्रमण को नियंत्रित करने के लिए कई सार्थक कदम उठाए हैं:

  • एकीकृत परामर्श एवं जांच केंद्र (ICTC) की स्थापना
  • संक्रमण की पुष्टि होने पर मुफ्त दवा और पूर्ण उपचार
  • संक्रमित बच्चों के लिए पेंशन व्यवस्था
  • गर्भवती संक्रमित महिलाओं के बच्चों के लिए 2 वर्ष तक निरंतर परीक्षण और उपचार
  • मुफ्त कानूनी सहायता, परामर्श और लोकपाल प्रणाली
  • संक्रमित व्यक्तियों को मुख्यधारा में जोड़ने के प्रयास
  • भेदभाव और कलंक के खिलाफ कानूनी सुरक्षा प्रावधान
  • पोस्ट-एक्स्पोज़र प्रोफिलेक्सिस (PEP) की व्यवस्था, जिससे उच्च जोखिम की स्थिति में संक्रमण की संभावना कम होती है

जागरूकता : सबसे प्रभावी बचाव

जानकारी ही बचाव है”—विभिन्न शोध बताते हैं कि जागरूकता कार्यक्रमों में बढ़ोतरी से संक्रमण की दर में प्रभावी कमी आती है।
समाज में कलंक समाप्त करने, नैतिकता के नाम पर होने वाले भेदभाव को रोकने, और वैज्ञानिक जागरूकता बढ़ाने की अत्यंत आवश्यकता है।


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