Jaunpur news .अणु से पारितंत्र तक’ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का तीसरा दिन रहा ज्ञानवर्धक, वैज्ञानिकों ने साझा किए शोध और समाधान
‘अणु से पारितंत्र तक’ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का तीसरा दिन रहा ज्ञानवर्धक, वैज्ञानिकों ने साझा किए शोध और समाधान
जौनपुर। “अणु से पारितंत्र तक : सतत संसाधन प्रबंधन के माध्यम से वैश्विक सुरक्षा” विषय पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन MEGASRM-2026 के तीसरे दिन देश-विदेश के प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों और शिक्षाविदों ने विभिन्न समसामयिक वैज्ञानिक विषयों पर अपने शोध और विचार प्रस्तुत किए। सम्मेलन में तंत्रिका विज्ञान, जलवायु परिवर्तन, संगणकीय जीनोमिक्स, क्वांटम विज्ञान, मृदा संरक्षण, कृषि अनुसंधान और पर्यावरणीय स्वास्थ्य जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तृत चर्चा हुई।
कार्यक्रम की शुरुआत बर्क न्यूरोलॉजिकल इंस्टीट्यूट, वील कॉर्नेल मेडिसिन, न्यूयॉर्क से जुड़े डॉ. अमित कुमार के व्याख्यान से हुई। उन्होंने “द स्वीट स्टोरी ऑफ ग्लूकोज़ : हाउ अ सिंपल मॉलिक्यूल शेप्स आवर मेमोरी” विषय पर प्रकाश डालते हुए बताया कि ग्लूकोज़ मस्तिष्क की ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है और यह स्मृति निर्माण तथा सीखने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
इसके बाद कनाडा की यूनिवर्सिटी ऑफ विनिपेग के जीवविज्ञान विभाग से जुड़ीं डॉ. तान्या वर्मा ने अपने व्याख्यान में फल-मक्खी के उदाहरण के माध्यम से जीवनकाल और प्रजनन क्षमता के बीच संबंधों को समझाया।
राष्ट्रीय औषधीय शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान, रायबरेली के डॉ. अशोक कुमार दतुसालिया ने “स्ट्रेस वल्नरेबिलिटी एंड रेज़िलिएंस बिहेवियर” विषय पर बोलते हुए बताया कि तनाव के दौरान मस्तिष्क में सूक्ष्म जैविक और संरचनात्मक परिवर्तन किस प्रकार व्यवहार को प्रभावित करते हैं।
भारतीय कृषि सांख्यिकीय अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली की वैज्ञानिक डॉ. सारिका साहू ने संगणकीय जीनोमिक्स और जलवायु परिवर्तन के बीच संबंधों पर प्रकाश डाला। वहीं पंजाब अभियांत्रिकी महाविद्यालय, चंडीगढ़ के प्रोफेसर संजीव कुमार ने क्वांटम भौतिकी से क्वांटम कंप्यूटिंग तक के विकास की वैज्ञानिक यात्रा को सरल शब्दों में समझाया।
पर्यावरण संरक्षण से जुड़े विषय पर आर.एस.के.डी. स्नातकोत्तर महाविद्यालय, जौनपुर की प्रोफेसर अनामिका सिंह ने जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने और अनुकूलन रणनीतियों पर अपने विचार रखे।
प्राणी विज्ञान के क्षेत्र में डॉ. प्रशांत कुमार ने “एवियन इंटेलिजेंस” विषय पर व्याख्यान देते हुए पक्षियों की स्मरण शक्ति, समस्या-समाधान क्षमता और संचार कौशल पर रोचक जानकारी साझा की।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी के प्रोफेसर पी.के. शर्मा ने मृदा में बढ़ते माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण और उसके पारिस्थितिक प्रभावों पर चर्चा करते हुए मृदा स्वास्थ्य और जलवायु संरक्षण के लिए प्रकृति आधारित उपायों की आवश्यकता बताई।
सम्मेलन के समापन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में आईसीएआर, नई दिल्ली के पूर्व एडीजी (पौध संरक्षण) और एएसआरबी के सदस्य रह चुके डॉ. पी.के. चक्रवर्ती ने कृषि रसायनों के उपयोग और उससे जुड़ी नीतियों पर अपने विचार प्रस्तुत किए।
इसके अलावा भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान, कानपुर के डॉ. राघवेंद्र सिंह ने ऑनलाइन माध्यम से “कार्बन फार्मिंग इन इंडिया” विषय पर व्याख्यान देते हुए कृषि के माध्यम से कार्बन संचयन की संभावनाओं और चुनौतियों पर चर्चा की।
आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, अयोध्या के प्रोफेसर हेमंत कुमार सिंह ने आंवला फसल में रस्ट रोग के समेकित प्रबंधन पर अपने शोध साझा किए। वहीं नेहरू ग्राम भारती डीम्ड विश्वविद्यालय, प्रयागराज की डॉ. किरण गुप्ता ने पेयजल में भारी धातुओं के प्रदूषण और उससे मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों पर विस्तृत जानकारी दी।
सम्मेलन का तीसरा दिन वैज्ञानिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण और ज्ञानवर्धक रहा। विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों के व्याख्यानों ने प्रतिभागियों को आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान की दिशा से अवगत कराया और सतत विकास के लिए बहुविषयक सहयोग की आवश्यकता पर जोर दिया।
