Jaunpur news प्रसूता अवकाश मामले कि शिकायत सीएम दरबार में

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प्रसूता अवकाश मामले कि शिकायत सीएम दरबार में

बदलापुर । विकास खंड बदलापुर की चर्चित ग्राम पंचायत अधिकारी निशा यादव के प्रसूता अवकाश की चर्चा जनपद में व्यापक रूप से गूंज उठी है।
हर कोई इस पूरे मामले में होने वाली कार्रवाई को जानना चाहता है। क्योंकि विकास के नाम पर इस अधिकारी द्वारा बड़े पैमाने पर खेल किया गया है।
फिलहाल इस पूरे मामले में जिला पंचायत अधिकारी नवीन सिंह प्रकरण का कब तक संज्ञान लेते हैं यह जनपद के बुद्धिजीवियों की जुबान पर अहम प्रश्न गूंज रहा है।
बताते चलें कि उक्त ग्राम पंचायत अधिकारी को जो भी गांव आवंटित किए गए थे अब ग्राम प्रधान भी लामबंद होकर एक स्वर में निशा यादव के कृत्यों की निन्दा करते देखे जा रहे हैं। विभागीय सूत्र बताते हैं कि इस मामले की शिकायत मुख्यमंत्री कार्यालय में की गई है।
शासन स्तर से इस बहुचर्चित मामले में बहुत जल्द सख्त कार्रवाई किए जाने का भरोसा दिया गया है।

फाइलों के रुख :

अंदाज बयां करते हैं कचहरी व्यस्त है ……

जौनपुर । अब न पहले जैसी न्याय पालिका है और न ही हाकिमों में ज्ञान की वह मीमांसा।
फाइलों का अंबार कचहरी की बेरुखी पीड़ा को स्वयं बयां करती दिख रही ।
कर्मचारी बेलगाम हैं कारण कि व्यवस्था धीरे-धीरे चरमराने लगी है।
पहले किसी भी जिले में जिला जज को दीवानी न्यायालय परिसर में कार्य करने की पूर्ण आजादी थी।
अब माननीय उच्च न्यायालय के निर्देश पर सारे कार्य अधीनस्थ न्यायालयों में होते आ रहे हैं । यहां तक कि तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी भी अब माननीय उच्च न्यायालय से ही भरे जाने लगे हैं।
परंपरा दर परंपरा की उलझन में न्यायपालिका के अधिकारों में भी व्यापक कटौती जैसी चुनौती परिलक्षित होती दिख रही है । जिससे चतुर्थ और तृतीय श्रेणी कर्मचारियों पर प्रभावी अंकुश लगाना टेढ़ी खीर साबित होने लगी है।
अभी हाल के दिनों में एक फाइल जो मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत से जे.एम.द्वितीय की अदालत में स्थानांतरित हो गई हैं को ढुढ़वाने की जुर्रत
में हमने सात महीने का समय बिताया।
अन्ततः फाइल तो मिली लेकिन उसमें पटल लिपिक की बेचैनी स्पष्ट थी । वह अधिवक्ताओं और वादकारियों की पीड़ा समझ कर भी मेज पर बैठे अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहे थे तस्वीर में स्पष्ट है कार्यालय में रखे अभिलेख और जगह के अभाव में दबी कुचली फाइलें ।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जहां असीम अधिकारों के साथ जिला एवं सत्र न्यायालय में पीठासीन अधिकारी अपनी विवेकानुसार विभिन्न पीठासीन न्यायालयों में व्याप्त कमियों को स्वत: दूर करते थे अब उन्हें उचित दिशा निर्देश के लिए माननीय उच्च न्यायालय से निर्देश प्राप्त करना होता है।
यह व्यावहारिक अड़चन पूरे प्रदेश में व्याप्त है रही बात तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी कर्मियों पर लगाम कसने की तो यह तथ्य भी सार्वभौमिक है कि इनकी नियुक्ति जब उच्च न्यायालय में बैठे माननीयों द्वारा की जाती है तो कहीं ना कहीं से उनके मामले में भी अनुशासनात्मक प्रक्रिया अपनाने में माननीय उच्च न्यायालय का ही हस्तक्षेप माना जा रहा है।
यह तथ्य कालांतर में वादकारियों और न्यायालय के लिए भी चुनौती के रूप में लिया जा सकता है।
बहरहाल यह समय और संयम का खेल है लोकतंत्र में अपनी बात कहना भी समस्या से अवगत कराना/ होना है । यह हमारा अभिमत है न कि किसी व्यवस्था पर टिप्पणी।
न्यायपालिका की शक्ति सर्वोपरि है वह स्वयं परीक्षण का अधिकार रखती है अतएव मुद्दे पर विचार किया जाना प्रासंगिक है।

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