Jaunpur news संयुक्त परिवार बनाम आधुनिक बाज़ार: सामाजिक ढांचे पर मंडराता अदृश्य खतरा
संयुक्त परिवार बनाम आधुनिक बाज़ार: सामाजिक ढांचे पर मंडराता अदृश्य खतरा
जौनपुर।
प्रो. (कैप्टन) डॉ. अखिलेश्वर शुक्ला ने एक विस्तृत लेख के माध्यम से भारतीय संयुक्त परिवार व्यवस्था पर आधुनिक बाज़ारवाद के बढ़ते प्रभाव और उससे उत्पन्न सामाजिक दुष्परिणामों पर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि आज देश में संयुक्त परिवारों को तोड़कर उपभोक्तावाद को बढ़ावा देने का एक सुनियोजित तंत्र सक्रिय है, जिससे सामाजिक संतुलन और पारिवारिक एकता पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है।
संयुक्त परिवार—एक मजबूत सामाजिक संरचना
उन्होंने बताया कि पहले तीन-तीन पीढ़ियां एक छत के नीचे रहती थीं। एक ही आंगन, एक चूल्हा, सामूहिक रसोई, साझा साधन-संपत्ति और मिल-जुलकर रहने का वातावरण—सब मिलकर बच्चों में संस्कार, सुरक्षा, सहयोग और उत्सवों में अपनापन पैदा करते थे। बुजुर्गों का सम्मान और मार्गदर्शन परिवार की धुरी हुआ करता था।
आधुनिक बाज़ार—टूटते रिश्तों के बीच बढ़ता व्यापार
डॉ. शुक्ला ने कहा कि आज फ्रिडम, न्यूक्लियर फैमिली, सेल्फमेड जैसी अवधारणाओं को ग्लैमराइज कर परिवारों को विभाजित करने की प्रवृत्ति बढ़ाई जा रही है। सास-बहू संघर्ष आधारित टीवी सीरियल, डिजिटल प्लेटफॉर्म, मोबाइल और मल्टीप्लेक्स के जरिए उपभोक्तावाद को बढ़ावा मिला है।
उन्होंने कहा कि जहाँ पहले एक परिवार में एक रसोई, एक वाहन, एक टीवी पर्याप्त था, वहीं अब हर सदस्य को अलग-अलग सुविधाएँ चाहिए—और यही बाज़ार की कमाई का सबसे बड़ा साधन बन गया है।
परिणाम—समाज में बढ़ता एकाकीपन
उन्होंने चेताते हुए कहा कि संयुक्त परिवार टूटने से—
- बुजुर्ग ‘बोझ’ समझे जाने लगे
- बच्चे मोबाइल स्क्रीन में कैद हो गए
- रिश्ते, संस्कार और सामूहिकता कमजोर होने लगी
- त्योहारों की आत्मीयता ई-कॉमर्स कंपनियों में सिमट गई
- विवाह और संस्कार भी परंपराओं से हटकर प्रदर्शन तक सीमित हो गए
उन्होंने कहा—”दादी-नानी की कहानी की जगह अब नेटफ्लिक्स ने ले ली है, और घर के खाने की जगह ज़ोमैटो का पैकेट… यही आधुनिक बाज़ारवाद का प्रभाव है।”
समाधान—संयुक्त परिवार को बचाना समय की मांग
डॉ. शुक्ला का कहना है कि सरकार से अधिक समाज को जागरूक होने की आवश्यकता है।
- संयुक्त परिवार को अमूल्य धरोहर समझें
- बच्चों को उपभोक्ता नहीं, संस्कारवान बनाएं
- बुजुर्गों का सम्मान और अनुभव को प्राथमिकता दें
- उपभोक्तावाद के खिलाफ सामाजिक आंदोलन चलाया जाए
उन्होंने अंत में आह्वान किया—
“जागो भारत, जागो उपभोक्ता”
और समाज से संयुक्त परिवार प्रणाली को पुनर्जीवित करने की अपील की।
