Jaunpur news जैविक खेती को प्रोत्साहित करने के लिए जिलाधिकारी ने अपनाई ढैंचा की खेती
जैविक खेती को प्रोत्साहित करने के लिए जिलाधिकारी ने अपनाई ढैंचा की खेती
“ढैंचा की खेती से मिट्टी की उर्वरता में होता है सुधार” – जिलाधिकारी डॉ. दिनेश चंद्र
Jaunpur news , जनपद जौनपुर में जैविक खेती को प्रोत्साहन देने की दिशा में जिलाधिकारी डॉ. दिनेश चंद्र द्वारा एक अहम कदम उठाया गया है। उन्होंने स्वयं ढैंचा की खेती कर किसानों को रासायनिक खेती से हटकर प्राकृतिक और टिकाऊ कृषि की ओर प्रेरित किया है। जिलाधिकारी ने बताया कि यह कदम खेती को लाभकारी, पर्यावरण अनुकूल और स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।
डॉ. चंद्र ने कहा कि परंपरागत खेती में रासायनिक उर्वरकों जैसे यूरिया, डीएपी, पोटाश और कीटनाशकों का अत्यधिक प्रयोग मिट्टी की सेहत, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो रहा है। जैविक खेती न केवल मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखती है, बल्कि उत्पादन की गुणवत्ता में भी सुधार करती है। ऐसे में ढैंचा जैसी हरी खाद फसलें एक प्रभावी समाधान के रूप में उभरी हैं।
क्या है ढैंचा और इसके लाभ:
ढैंचा एक प्रकार की दलहनी फसल है, जिसकी जड़ों में मौजूद जीवाणु नाइट्रोजन को वायुमंडल से अवशोषित कर मिट्टी में स्थिर करते हैं। इससे खेतों में प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन की आपूर्ति होती है, जिससे रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम हो जाती है। मात्र 45 दिनों में ढैंचा के पौधे लगभग 3 फीट तक बढ़ जाते हैं और इसी समय इन्हें काटकर खेतों में मिला दिया जाता है। इस प्रक्रिया को “हरी खाद” तैयार करना कहा जाता है।
डॉ. चंद्र ने बताया कि यह विधि हजारों वर्षों से किसानों द्वारा अपनाई जाती रही है और यह लागत में बेहद कम, लेकिन प्रभाव में अत्यंत कारगर है। इससे मिट्टी में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश की मात्रा बढ़ती है, जिससे फसलों को आवश्यक पोषक तत्व प्राप्त होते हैं और उत्पादन में वृद्धि होती है।
पर्यावरण और कृषि में बहुआयामी उपयोगिता:
ढैंचा की पत्तियों में प्राकृतिक कीटनाशक गुण होते हैं, जो कीट-पतंगों से फसलों की रक्षा करते हैं। इसके अलावा, यह पौधा कार्बनडाइऑक्साइड अवशोषित कर वायुमंडल को भी स्वच्छ बनाता है। इसकी जड़ें मिट्टी की गहराई से पोषक तत्व ऊपर लाती हैं, जिससे भूमि की जैविक संरचना मजबूत होती है।
ढैंचा को सह-फसली खेती के रूप में भी अपनाया जा सकता है, यानी अन्य फसलों के साथ इसे खेतों के बीच लगाया जा सकता है। इससे खरपतवारों की संभावना कम हो जाती है और नमी का संरक्षण होता है।
आर्थिक और सामाजिक लाभ:
ढैंचा की खेती से किसानों को चारे के रूप में भी लाभ होता है, जिससे पशुपालन को प्रोत्साहन मिलता है। एक हेक्टेयर क्षेत्र में लगभग 10 क्विंटल ढैंचा का उत्पादन संभव है, जो हरी खाद और जलावन के रूप में उपयोगी होता है। इससे किसानों की आय बढ़ती है और खेती की लागत घटती है।
डॉ. चंद्र ने सभी किसानों से अपील की है कि वे इस जैविक पहल का हिस्सा बनें और प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी तथा मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ के “दुगनी आय” और “प्राकृतिक खेती” के लक्ष्य को साकार करने में सहयोग करें। उन्होंने कहा कि गांवों में जैविक खेती की ओर उठाया गया यह कदम भविष्य में राष्ट्रीय स्तर पर परिवर्तन की बुनियाद बन सकता है।
निष्कर्ष:
जिलाधिकारी द्वारा उठाया गया यह कदम न केवल कृषि सुधार की दिशा में सराहनीय है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण, आर्थिक आत्मनिर्भरता और ग्रामीण विकास का भी एक सशक्त माध्यम है। जैविक खेती, विशेषकर ढैंचा की खेती, आने वाले समय में टिकाऊ कृषि की रीढ़ बन सकती है। ऐसे प्रयासों से “जय किसान, जय विज्ञान, जय अनुसंधान” के सपनों को मूर्त रूप दिया जा सकता है।
