Jaunpur news गौशाला की अव्यवस्थाओं को उजागर करना पड़ा भारी: पत्रकारों पर दर्ज फर्जी एफआईआर को हाईकोर्ट ने किया रद्द
गौशाला की अव्यवस्थाओं को उजागर करना पड़ा भारी: पत्रकारों पर दर्ज फर्जी एफआईआर को हाईकोर्ट ने किया रद्द
केराकत पुलिस को हाईकोर्ट की फटकार, पत्रकारों को राहत
केराकत, जौनपुर।
Jaunpur news गौशाला की दुर्दशा पर पत्रकारिता करना चार पत्रकारों को उस समय महंगा पड़ गया, जब ग्राम प्रधान और अधिकारियों के दबाव में आकर केराकत पुलिस ने उनके खिलाफ वसूली समेत पांच गंभीर धाराओं में झूठा मुकदमा दर्ज कर दिया। लेकिन दो वर्षों की न्यायिक लड़ाई के बाद अब इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पत्रकारों को राहत देते हुए मुकदमा पूरी तरह से रद्द कर दिया है। कोर्ट ने केराकत पुलिस की भूमिका पर सख्त टिप्पणी करते हुए एफआईआर को द्वेषभाव और प्रताड़ना से प्रेरित बताया है।

मामला क्या था?
24 मार्च 2023 को क्षेत्र के पेसारा गांव स्थित गौशाला की दुर्दशा पर पत्रकार पंकज, आदर्श, अरविंद और विनोद ने समाचार प्रकाशित किया था। खबर में यह दिखाया गया कि किस तरह से गायों को अस्थायी बाड़ों में बंद कर मरने के लिए छोड़ दिया गया है। इस खबर से खिन्न होकर ग्राम प्रधान चंदा देवी ने कथित तौर पर अधिकारियों की शह पर पत्रकारों के खिलाफ गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज कराई। इसमें वसूली, एससी/एसटी एक्ट समेत पांच आपराधिक धाराएं लगाई गईं।
पुलिसिया उत्पीड़न और अधिकारियों की उदासीनता
एफआईआर दर्ज होने के बाद स्थानीय पुलिस ने पत्रकारों को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। चारों पत्रकारों ने इसकी शिकायत उच्च अधिकारियों से की, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। जिला प्रशासन और पुलिस अधिकारी “हम ना मानब” की तर्ज पर आंख मूंदे बैठे रहे। तब पत्रकारों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और याचिका संख्या 2569/2024 दाखिल की।
हाईकोर्ट ने सुनाया न्याय
हाईकोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए पत्रकारों की गिरफ्तारी पर पहले रोक लगाई और फिर केस की पूरी जांच करवाई। 17 सितंबर 2024 को न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि एफआईआर दुर्भावना से प्रेरित थी और इसे महज प्रताड़ना के उद्देश्य से दर्ज किया गया था। इसके बाद विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी कोर्ट) ने भी मुकदमे से संबंधित संपूर्ण दांडिक कार्रवाई को निरस्त कर दिया।
प्रेस परिषद की कड़ी टिप्पणी
भारतीय प्रेस परिषद ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए स्वत: संज्ञान लिया था। परिषद ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव, गृह सचिव, डीजीपी, जिलाधिकारी व पुलिस अधीक्षक जौनपुर को पत्र भेजते हुए कड़ी आपत्ति जताई। पत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि “ऐसा प्रतीत होता है कि पत्रकारों पर दबाव बनाने के उद्देश्य से ही ग्राम प्रधान ने अधिकारियों के इशारे पर मुकदमा दर्ज कराया है।”
जिला प्रशासन पर पत्रकारों का दबाव
पत्रकारों पर हो रहे फर्जी मुकदमे को लेकर जिला मुख्यालय के पत्रकारों ने एक बैठक कर डीएम की प्रेस वार्ता का बहिष्कार करने का निर्णय लिया था। इस बहिष्कार से प्रशासन में हड़कंप मच गया। तत्कालीन जिलाधिकारी अनुज कुमार झा ने पत्रकारों से बैठक कर मामले को सुलझाने की कोशिश की, लेकिन इसके बावजूद पुलिस ने न्यायालय में चार्जशीट दाखिल कर दी।
विनोद कुमार बोले – संविधान और न्यायपालिका पर था भरोसा
सेनापुर निवासी पत्रकार विनोद कुमार ने बताया, “मैं दलित हूं, लेकिन पुलिस ने मुझे दूसरी जाति का दर्शाकर दलित उत्पीड़न समेत झूठे आरोप लगाए। हमारी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, फिर भी हम डरे नहीं। हमें संविधान और न्यायपालिका पर पूर्ण विश्वास था। आज न्याय मिला है और अब हम मानहानि का केस दर्ज कर संबंधित अधिकारियों की करतूत को एससी/एसटी आयोग और प्रेस परिषद के सामने उजागर करेंगे, ताकि भविष्य में किसी पत्रकार को इस तरह की प्रताड़ना न झेलनी पड़े।”
निष्कर्ष:
यह मामला केवल पत्रकारों की व्यक्तिगत लड़ाई नहीं थी, बल्कि यह लोकतंत्र की उस मूल भावना की जीत है, जिसमें प्रेस की स्वतंत्रता और निष्पक्षता सर्वोपरि मानी जाती है। उच्च न्यायालय के इस फैसले ने न केवल पत्रकारों को न्याय दिलाया, बल्कि पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों को भी चेताया कि सत्ता का दुरुपयोग करने वालों को कानून के दायरे में आना ही होगा।
