January 31, 2026

Jaunpur news संविधान संशोधन नहीं, सोच में सुधार जरूरी: राजनीति की विभाजनकारी प्रवृत्तियों पर प्रो. अखिलेश्वर शुक्ला का तीखा प्रहार”

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“संविधान संशोधन नहीं, सोच में सुधार जरूरी: राजनीति की विभाजनकारी प्रवृत्तियों पर प्रो. अखिलेश्वर शुक्ला का तीखा प्रहार”

जौनपुर।
77वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर देशभर में जहां राष्ट्रभक्ति और उल्लास का माहौल रहा, वहीं प्रख्यात शिक्षाविद् एवं पूर्व प्राचार्य प्रोफेसर (कैप्टन) डॉ. अखिलेश्वर शुक्ला ने भारतीय राजनीति और सामाजिक दिशा को लेकर गंभीर चिंतन प्रस्तुत किया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि संविधान में बदलाव से ज्यादा जरूरी समाज और राजनीति की सोच में परिवर्तन है।
उन्होंने कहा कि भारत का संविधान गहन अध्ययन, विमर्श और विश्व के अनेक लोकतांत्रिक ढांचों के विश्लेषण के बाद संविधान सभा द्वारा तैयार किया गया था। अब तक इसमें 106 संशोधन हो चुके हैं, जिन्हें समय की जरूरत बताया जाता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या हमारी मानसिकता और राजनीतिक प्राथमिकताएं भी समय के साथ बदली हैं?
प्रो. शुक्ला ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि जब भी समाज में कोई समस्या आती है, तो विकास और आधुनिकीकरण की बातें की जाती हैं, लेकिन राजनीतिक दल अक्सर समाज को जोड़ने के बजाय तोड़ने वाली नीतियों को प्राथमिकता देते हैं। उन्होंने कहा कि लोकलुभावन नारों के सहारे जनता को भ्रमित करना आसान हो गया है, जबकि शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा जैसे मूल मुद्दे हाशिए पर चले गए हैं।
उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 14 से 18 का उल्लेख करते हुए कहा कि समानता का अधिकार केवल कानूनी प्रावधान नहीं, बल्कि सामाजिक आचरण का आधार होना चाहिए। कानून के समक्ष समानता और अवसर की समानता से किसी को वंचित नहीं किया जा सकता, यही संविधान की आत्मा है।
प्रो. शुक्ला ने यह भी कहा कि आज पिछड़े वर्गों का उच्च पदों पर पहुँचना गर्व का विषय है, लेकिन यदि सामाजिक न्याय को सत्ता प्राप्ति का साधन बना दिया जाए, तो उसका मूल उद्देश्य ही नष्ट हो जाता है। बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कभी नहीं चाहा होगा कि सामाजिक संतुलन की व्यवस्था राजनीतिक स्वार्थों की भेंट चढ़ जाए।
उन्होंने कहा कि विभाजनकारी नीतियों से न रोजगार सृजन होगा और न ही सामाजिक समरसता, बल्कि इससे केवल राजनीतिक लाभ लेने वालों को ताकत मिलेगी। राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने संयुक्त परिवार से लेकर सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों तक को प्रभावित किया है।
प्रो. शुक्ला ने जोर देते हुए कहा कि भारत की वैश्विक आर्थिक प्रगति का आधार उसकी बौद्धिक क्षमता, सांस्कृतिक विरासत और अनेकता में एकता की भावना है। यदि इस एकता को कमजोर करने वाली प्रवृत्तियों का समय रहते विरोध नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी।
अंत में उन्होंने अपील की कि समाज के कमजोर और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए सौहार्द और समन्वय के साथ प्रयास किया जाए, न कि द्वेष और विभाजन के रास्ते पर चलकर।
उन्होंने अपने वक्तव्य का समापन राष्ट्रीय एकता के संदेश के साथ किया—
“भारतीय सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय एकता अमर रहे—जय हिंद, जय भारत।”
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