Jaunpur news कड़ाके की ठंड से पशुपालक परेशान, दुधारू पशुओं का घटा उत्पादन, बढ़ी देखभाल की चुनौती
कड़ाके की ठंड से पशुपालक परेशान, दुधारू पशुओं का घटा उत्पादन, बढ़ी देखभाल की चुनौती
जौनपुर। जिले में पड़ रही कड़ाके की ठंड और गलन का असर अब पशुपालन पर भी साफ दिखाई देने लगा है। ठंड से जहां आम जनजीवन प्रभावित है, वहीं पशु-पक्षी भी इससे अछूते नहीं हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालक अपने पालतू जानवरों को ठंड से बचाने के लिए तरह-तरह के उपाय कर रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद दुधारू पशुओं की दूध देने की क्षमता में गिरावट देखी जा रही है, जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।
ग्रामीण इलाकों में किसान गाय और भैंस को ठंड से बचाने के लिए पुराने कपड़े और जूट के बोरे सिलकर उन्हें ओढ़ा रहे हैं। सुबह-शाम धूप निकलने तक पशुओं को ढककर रखने का सिलसिला जारी है। जहां बड़े पशुशालाओं में पशुओं के खाने-पीने की व्यवस्था शेड के भीतर बनी नादों में होती है, वहीं छोटे पशुपालकों के यहां पशु अक्सर खुले छप्परों में रखे जाते हैं और चारा बाहर खिलाना मजबूरी बन जाता है, जिससे ठंड का असर और बढ़ जाता है।
ठंड के कारण पशुओं की भूख और स्वास्थ्य पर असर पड़ रहा है। पशुपालक हरे चारे के साथ भूसा और अतिरिक्त दाना देकर पशुओं की ऊर्जा बनाए रखने का प्रयास कर रहे हैं। चारा खिलाने के बाद पशुओं को चारों ओर से बंद छप्परों में सुरक्षित रखा जा रहा है ताकि ठंडी हवा से बचाव हो सके।
विकास खंड मछलीशहर के ग्राम बामी निवासी पुल्लू यादव का कहना है कि ठंड के मौसम में दुधारू पशुओं के साथ-साथ नवजात बछड़ों की देखभाल पर विशेष ध्यान देना चाहिए। वे बताते हैं कि पशुओं को सरसों का तेल और गुड़ देने से ठंड के प्रभाव को कम करने में मदद मिलती है। इसके अलावा सामान्य दिनों की तुलना में अधिक दाना देना भी जरूरी है।
उन्होंने पशुपालकों को सलाह दी कि यदि पशु चारा ठीक से न खाएं, मुंह से लार गिरने लगे या खांसी जैसे लक्षण दिखें तो तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए। साथ ही पशुशाला में बैठने की जगह को साफ-सुथरा रखते हुए राख या पुरेसा डालकर सूखा बनाए रखना चाहिए, ताकि पशु ठंड और नमी से सुरक्षित रह
