January 25, 2026

Jaunpur news ऑनलाइन शॉपिंग के दौर में भी गांवों के मेले बने खुदरा व्यापार की धड़कन सामूहिकता और परंपरा का जीवंत प्रतीक

Share


ऑनलाइन शॉपिंग के दौर में भी गांवों के मेले बने खुदरा व्यापार की धड़कन — सामूहिकता और परंपरा का जीवंत प्रतीक

मछलीशहर (जौनपुर)। डिजिटल युग और ऑनलाइन शॉपिंग के इस दौर में भी ग्रामीण इलाकों के पारंपरिक मेले आज भी खुदरा व्यापार की रीढ़ बने हुए हैं। नवरात्रि के बाद से गांव-गांव में लगने वाले ये छोटे-छोटे मेले न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति देते हैं, बल्कि सामाजिक मेल-जोल और पारंपरिक संस्कृति की जीवंत झलक भी पेश करते हैं।

नवरात्रि के समापन के साथ ही रामलीला के बाद विभिन्न गांवों में मेले शुरू हो गए हैं, जो दीपावली तक जारी रहेंगे। जैसे ही किसी गांव में रामलीला समाप्त होती है, वैसे ही अगले दिन मेला सज जाता है। विकास खंड मछलीशहर के बामी गांव में गुरुवार की शाम रामलीला के समापन पर लगा मेला इस परंपरा की एक सुंदर मिसाल रहा।

मेले में जलेबी, गट्टा, फल, मिठाइयां, खिलौने, साज-श्रृंगार की वस्तुएं और तरह-तरह की दुकानों पर खरीदारों की भीड़ उमड़ी रही। शनिवार को धनतेरस होने के कारण न केवल मेलों में बल्कि पूरे मछलीशहर तहसील क्षेत्र के बाजारों में भी जबरदस्त रौनक देखने को मिल रही है। अखबारों के पन्ने छूट और ऑफ़र के विज्ञापनों से भरे हैं, वहीं गांवों के मेले अपने पुराने आकर्षण और उत्सव भावना से लोगों को जोड़ रहे हैं।

बामी गांव के बच्चे, विशेषकर स्कूलों की परीक्षा समाप्त होने के बाद, मेले का आनंद लेने के लिए बेहद उत्साहित नजर आए। छोटे साहस सिंह जैसे बच्चों के लिए मेला न सिर्फ मनोरंजन का साधन है, बल्कि सालभर का सबसे बड़ा इंतजार भी।

आधुनिकता और पूंजीवाद के प्रभाव ने जहां शहरी समाज में व्यक्तिवाद और प्रतिस्पर्धा को जन्म दिया है, वहीं ग्रामीण समाज अब भी अपनी सामूहिकता और सामाजिकता से जुड़ा हुआ है। इन मेलों में आज भी इतनी आर्थिक गतिविधि होती है कि स्थानीय खुदरा व्यापारी पूरे महीने तक लाभ में रहते हैं।

गांवों के व्यापारी आपस में लगातार जानकारी साझा करते हैं कि “आज किस गांव में मेला है और कल कहां लगने वाला है।” यह बताता है कि ग्रामीण मेले आज भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक ताने-बाने के सशक्त प्रतीक बने हुए हैं।

About Author