August 21, 2026

​jaunpur news लुलु मॉल की दादागीरी पर उपभोक्ता कोर्ट का तमाचा: 16 रुपये के कैरी बैग के चक्कर में लगा ₹4,516 का जुर्माना!

Share

​लुलु मॉल की दादागीरी पर उपभोक्ता कोर्ट का तमाचा: 16 रुपये के कैरी बैग के चक्कर में लगा ₹4,516 का जुर्माना!

​बड़ी ख़बर: “मॉल के अंदर अपना बैग मत लाओ और हमारा कैरी बैग ख़रीदने के लिए मजबूर हो जाओ…” कॉर्पोरेट कंपनियों के इस ‘लूट तंत्र’ को कोर्ट ने बेनकाब कर दिया है। लखनऊ के मशहूर लुलु मॉल (Lulu Mall) को ग्राहक से कैरी बैग के ₹16 वसूलना बेहद भारी पड़ गया है।

जौनपुर जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग के अध्यक्ष विनोद कुमार सिंह और सदस्य गीता की कोर्ट ने लुलु हाइपरमार्केट के मैनेजर को ‘सेवा में कमी’ और ‘अनुचित व्यापारिक व्यवहार’ (Unfair Trade Practice) का दोषी पाते हुए तगड़ा हर्जाना ठोक दिया है।

​अदालत का कड़ा आदेश: 45 दिन में चुकाएं हर्जाना, नहीं तो लगेगा ब्याज!
​कोर्ट ने लुलु मॉल को आदेश दिया है कि वे पीड़ित उपभोक्ता को निर्णय के 45 दिनों के भीतर निम्नलिखित हर्जाना भुगतें:
​₹16 (कैरी बैग की जबरन वसूली गई कीमत)
​₹1,500 (मानसिक उत्पीड़न और अनुचित व्यापारिक व्यवहार के लिए)
​₹3,000 (मुकदमा लड़ने का खर्च/परिवाद व्यय)

​चेतावनी: यदि मॉल ने 45 दिन के भीतर यह राशि (कुल ₹4,516) अदा नहीं की, तो उन्हें 6% वार्षिक ब्याज के साथ यह रकम चुकानी होगी।

​क्या था पूरा मामला? कैसे बिछाया गया था ‘लूट का जाल’
​जौनपुर (उमरपुर, रूहट्टा) के रहने वाले जागरूक नागरिक घनश्याम प्रसाद ओझा ने अधिवक्ता हिमांशु श्रीवास्तव के जरिए उपभोक्ता फोरम में लुलु मॉल के खिलाफ जंग छेड़ी थी।
​1 मार्च 2025 को घनश्याम प्रसाद ने लखनऊ के लुलु मॉल से ₹669 का खाने-पीने का सामान खरीदा। बिलिंग काउंटर पर उनसे बिना बताए कैरी बैग के नाम पर ₹16 अतिरिक्त वसूल लिए गए।

​मॉल का वो ‘सीक्रेट नियम’ जिससे जनता थी अनजान:
​अपना बैग ले जाने पर रोक: मॉल का नियम है कि ग्राहक अपना कोई कैरी बैग अंदर नहीं ले जा सकता। यानी आपको उनका बैग लेने के लिए मजबूर किया जाता है।

​कोई सूचना नहीं: खरीदारी करने से पहले या काउंटर पर कहीं भी यह नहीं लिखा था कि बैग के अलग से पैसे लगेंगे।

​कीमत गायब: जो कैरी बैग बेचा गया, उस पर भी उसकी कोई कीमत प्रिंट नहीं थी।
​जब मॉल के वकीलों ने कोर्ट में बचने के लिए कुछ कथित फोटोग्राफ्स दिखाए, तो परिवादी ने अकाट्य तर्क दिया कि “अगर कैरी बैग बेचा जा रहा है, तो वह ‘वस्तु’ (Goods) की श्रेणी में आता है। ग्राहक को उसकी विशेषता और कीमत पहले से जानने का पूरा हक है, ताकि वह तय कर सके कि उसे बैग खरीदना है या नहीं।”

​उपभोक्ता कोर्ट की वो टिप्पणियां, जो हर ग्राहक को जाननी चाहिए!
​अदालत ने लुलु मॉल जैसी बड़ी कंपनियों के चेहरे से ‘पर्यावरण प्रेम’ का मुखौटा उतारते हुए बेहद तीखी और ऐतिहासिक टिप्पणियां कीं:

​”सामान पसंद करने के बाद, बिना पहले बताए, जबरन अपनी तय कीमत पर कैरी बैग थमा देना उपभोक्ता को शर्मिंदगी और उत्पीड़न की स्थिति में डालना है। यह सीधे-सीधे अनुचित लागत का बोझ डालना है।”

​”अगर ये कंपनियां खुद को जिम्मेदार और पर्यावरण के प्रति जागरूक होने का दावा करती हैं, तो इन्हें कैरी बैग मुफ्त में देना चाहिए! आमतौर पर कैरी बैग की कीमत उत्पाद के लाभ मार्जिन (Profit Margin) में पहले से ही शामिल होती है।”

​”ये कॉर्पोरेट घराने ‘अनुचित व्यापारिक व्यवहार’ का खेल खेलकर देश भर में फैले अपने स्टोरों के जरिए भोले-भाले ग्राहकों से हर दिन करोड़ों का भारी मुनाफा कमा रहे हैं। यह पूरी तरह सेवा में कमी है।”

​जनहित में संदेश: जागते रहिए, आवाज उठाते रहिए!
​यह फैसला देश के उन लाखों उपभोक्ताओं की जीत है जो रोज़ मॉल और सुपरमार्केट्स में ₹10, ₹15, ₹20 के कैरी बैग के नाम पर ठगे जाते हैं और ‘छोटी रकम’ समझकर चुप रह जाते हैं। परिवादी ने अवैध वसूली के खिलाफ लड़कर यह साबित कर दिया कि कानून के आगे बड़ी से बड़ी मल्टिनेशनल कंपनी भी बौनी है।

​अगली बार जब कोई मॉल आपसे जबरन कैरी बैग के पैसे मांगे, तो डरिए मत, इस फैसले का हवाला दीजिए और अपनी जेब कटने से बचाइए!

About Author