रुक्मणी विवाह की झांकी बनी आकर्षण का केंद्र

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रुक्मणी विवाह की झांकी बनी आकर्षण का केंद्र

शाहगंज। विकासखंड क्षेत्र सुइथाकला अंतर्गत सुइथाकला गांव में यजमान रामचंद्र लाल श्रीवास्तव के घर चल रही भागवत कथा के छठवें दिन कथावाचक पं. हरिचयन शांडिल्य जी महाराज के श्री मुख से ज्ञान की अविरल गंगा प्रवाहित हुई जिसमें समस्त श्रोता डूब गए।रुक्मणी विवाह प्रसंग सुनकर श्रोता मंत्रमुग्ध हो गए। भागवत कथा में रुक्मणी विवाह की झांकी आकर्षण का केंद्र रही जिसे देखकर लोग भाव विभोर हो गए। सुंदर और मनोहर झांकी दर्शकों और क्षेत्र वासियों के बीच चर्चा का विषय रही। उपस्थित दर्शक भगवान श्री कृष्णा और रुक्मणी के विवाह के वास्तविक आनंद की अनुभूति करने लगे। आध्यात्मिक आनंद में इस कदर लोग डूब गए जैसे वह सचमुच श्री कृष्ण और रुक्मणी का विवाह देखकर भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी के वास्तविक स्वरूप का दर्शन करके उस अलौकिक और अद्भुत फल को प्राप्त कर रहे थे।

कथावाचक ने कहा कि भगवान श्री कृष्ण का व्यक्तित्व अलौकिक था। ईश्वर कर्ता होने के बाद भी अकर्ता बना रहता है। कोई भी कर्म करने के बाद भी परमात्मा कर्म के फल से मुक्त रहता है। भगवान श्री कृष्ण के कार्य में भक्तों और सत्य पक्ष का हित छिपा हुआ था। इस धरती पर ईश्वर के अवतार लेने के उद्देश्य होते हैं जिन्हें भगवान को पूर्ण करना होता है।रुक्मणी विदर्भ देश के राजा भीष्म की पुत्री और साक्षात लक्ष्मी जी का अवतार थी। रुक्मणी ने जब देवर्षि नारद के मुख से श्रीकृष्ण के रूप, सौंदर्य एवं गुणों की प्रशंसा सुनी तो उसने मन ही मन श्रीकृष्ण से विवाह करने का निश्चय किया। रुक्मणी का बड़ा भाई रुक्मी श्रीकृष्ण से शत्रुता रखता था और अपनी बहन का विवाह चेदिनरेश राजा दमघोष के पुत्र शिशुपाल से कराना चाहता था। रुक्मणी को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने एक ब्राह्मण संदेशवाहक द्वारा श्रीकृष्ण के पास अपना परिणय संदेश भिजवाया। तब श्रीकृष्ण विदर्भ देश की नगरी कुंडीनपुर पहुंचे और वहां बारात लेकर आए शिशुपाल व उसके मित्र राजाओं शाल्व, जरासंध, दंतवक्त्र, विदु रथ और पौंडरक को युद्ध में परास्त करके रुक्मणी का उनकी इच्छा से हरण कर लाए। वे द्वारिकापुरी आ ही रहे थे कि उनका मार्ग रुक्मी ने रोक लिया और कृष्ण को युद्ध के लिए ललकारा।

तब युद्ध में श्रीकृष्ण व बलराम ने रुक्मी को पराजित करके दंडित किया। तत्पश्चात श्रीकृष्ण ने द्वारिका में अपने संबंधियों के समक्ष रुक्मणी से विवाह किया। पंडित शांडिल्य जी महाराज ने कहा कि समय और परिस्थिति के अनुसार भगवान को भी उचित निर्णय लेने पड़ते हैं।रुक्मणी श्रीकृष्ण को पसंद करती थीं और उन्हें मन ही मन अपना पति स्वीकार कर चुकी थीं. श्रीकृष्ण को पता चला कि रुक्मणी का विवाह उनकी इच्छा के विरुद्ध किसी और के साथ हो रहा है. तब उन्होंने रुक्मणी से विवाह रचा लिया. रुक्मणी की इच्छा के विरुद्ध उन्होंने उनसे विवाह नहीं किया था।
मुख्य आयोजक एवं शिक्षक विनय श्रीवास्तव ने दूर-दूर से आए हुए आगंतुकों के प्रति आभार प्रकट करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया। इस अवसर पर इस अवसर पर श्री गांधी स्मारक इंटर कॉलेज समोधपुर के अंग्रेजी प्रवक्ता विनय त्रिपाठी, पारसनाथ यादव ,राणा प्रताप ,रमेश सिंह, कृपा शंकर श्रीवास्तव ,लक्ष्मी वर्मा, विपिन पांडेय,अनु उपाध्याय, अभिषेक दुबे आदि उपस्थित रहे।

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